Tuesday, August 30, 2011

मेरिडियन चिकित्सा विज्ञान (Meridianology)

                                              अंक-I
                                                         -    आचार्य परशुराम राय
 
मनुष्य अपने अस्तित्व में आने के समय से ही बाह्य प्रकृति और अन्तःप्रकृति की समस्याओं का समाधान पाने के लिए प्रयत्नशील रहा है। परिणाम स्वरूप विभिन्न विज्ञान एवं उनकी शाखाएँ-प्रशाखाएँ अस्तित्व में आयीं। बाह्य प्रकृति के परिवर्तन हमारी अन्तःप्रकृति को अनवरत प्रभावित करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त हमारे रहन-सहन एवं सोचने की शैली हमारी अन्तःप्रकृति को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं और इससे हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की दिशा निर्धारित होती है। हमारे स्वास्थ्य की रखवाली के लिए अनेक चिकित्सा प्रणालियों का जन्म हुआ। इन्हीं चिकित्सा-प्रणालियों में एक है मेरिडियन चिकित्सा विज्ञान। इसके अन्तर्गत एक्युपंक्चर और एक्युप्रेशर के द्वारा चिकित्सा की जाती है। इस चिकित्सा पद्धति का उल्लेख सुश्रुत-संहिता में भी मिलता है। लेकिन इसे एक स्वतंत्र चिकित्सा पद्धति के रूप में संस्थापित करने का श्रेय चीन के उन महान चिकित्सा-शास्त्रियों को जाता है, जिन्होंने अपने अथक परिश्रम से इसे मानव जाति के कल्याण के लिए सम्पोषित और संवर्धित किया।
जिस प्रकार भारतीय चिकित्सा-पद्धतियों का भारतीय दर्शन से गहरा सम्बन्ध है, उसी प्रकार इस चीनी चिकित्सा-पद्धति का चीनी दर्शन से। वैसे चीनी दर्शन और भारतीय दर्शन काफी निकट हैं। दोनों ही दर्शनों के अनुसार मानव शरीर या जीव इस अखिल ब्रह्माण्ड की अनुकृति है, अर्थात् ब्रह्माण्ड स्थूल है तो मानव शरीर उसका सूक्षम रूप है। हम यहाँ दोनों दर्शनों की तुलना न कर चीनी दर्शन के उस पहलू को स्पर्श करेंगे, जिसपर यह चिकित्सा पद्धति विकसित हुई है।
चीनी दर्शन, विशेषकर ताओ दर्शन, के अनुसार प्रारम्भ में यह ब्रह्माण्ड बिलकुल अव्यवस्थित था। लेकिन यिन (Yin) और यंग (Yang) दो ऋणात्मक और धनात्मक ऊर्जाओं का उसमें आधान होने से एक व्यवस्था का जन्म हुआ।
ये दोनों ऊर्जाएँ एक-दूसरे में इस प्रकार अनुस्यूत हैं कि उन्हें अलग करना कठिन है। इस सन्दर्भ में महाकवि कालिदास की पंक्तियाँ वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।द्रष्टव्य हैं। इसका अर्थ है कि वाणी और उसका अर्थ जिस प्रकार एक-दूसरे से गुम्फित हैं, उसी प्रकार माता पार्वती एवं भगवान शिव, और ऐसे जगत के दोनों माता-पिता के रूप में मैं उनकी वन्दना करता हूँ। यही स्थिति यिन और यंग की है। इन दोनों का संतुलन ही स्वास्थ्य है और असन्तुलन रोग का कारक। चाहे बाह्य-प्रकृति हो या जीव की अन्तःप्रकृति, इनमें असन्तुलन से उपद्रव शुरु हो जाता है। बाह्य-प्रकृति में इन ऊर्जाओं के असन्तुलन से भूचाल, ज्वालामुखी, तूफान आदि जैसे उपद्रव देखे जाते हैं। शरीर के विभिन्न आन्तरिक अंगों से शरीर के बाहरी सतह की ओर और बाहरी सतह से आंतरिक अंगों की ओर इन ऊर्जाओं की धाराएँ (channels) प्रवाहित होती रहती हैं। इन प्रवाहमान धाराओं में व्यवधान उत्पन्न होने से हम अस्वस्थ हो जाते हैं। ये धाराएँ हमारी शारीरिक प्रकृति को बाह्य-प्रकृति से जोड़ती हैं। यिन और यंग ऊर्जाएँ ज़ैंग (Zang) और फू (Fu) अंगों को संयोजित करती हैं। ज़ैंग वे अंग होते हैं जो संचय करने का काम करते हैं और फू वे अंग होते हैं जो ग्रहण करने का काम करते हैं। चीनी भाषा में जैंग का अर्थ संचय करना और फू का अर्थ ग्रहण करना है। बीजिंग से प्रकाशित इसेंशियल्स आफ चाइनिज़ एक्युपंक्चर नामक पुस्तक में हमारे शरीर में यिन और यंग ऊर्जा धाराओं के सम्बन्ध में बताया गया है कि हमारे शरीर के ऊतक (Tissues) और अंग अपनी स्थिति और क्रिया के अनुसार या तो यिन से या फिर यंग से जुड़े होते हैं। शरीर के धड़ और हाथ-पाँव की बाहरी सतह यंग से जुड़े होते हैं, जबकि ज़ैंग-फू आन्तरिक अंग यिन से। यदि शरीर की केवल ऊपरी सतह को लिया जाए, तो पिछला हिस्सा यंग से और सामने का हिस्सा यिन से जुड़ा है, कमर के ऊपर का हिस्सा यंग से तो नीचे का यिन से। यदि हाथ-पाँव के पार्श्वभाग यंग से जुड़े हैं, तो सामने के भाग यिन से। यदि केवल जैंग-फू अंगों की बात की जाए, तो फू (ग्रहण करने वाले अंग) यंग धारा से जुड़े हैं, जबकि जैंग (संचय करे वाले अंग) यिन से। प्रत्येक जैंग-फू अंग स्वतंत्र रूप से यिन और यंग ऊर्जाओं से ओत-प्रोत हैं, जैसे हृदय के यिन और यंग, किडनी के यिन और यंग आदि। संक्षेप में कहा जाय तो मानव शरीर के सभी अंग और उसकी गतिविधियाँ यिन और यंग के संबन्धों से समझी जा सकता है। वास्तव में इन्हें धनात्मक और ऋणात्मक ध्रुवों की संज्ञा दी जा सकती है।
ये दोनों ऊर्जा-धाराएँ एक दूसरे के कार्य और कारण हैं। एक के अभाव में दूसरे के अस्तित्व की कल्पना असम्भव है। ये दोनों एक दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। इनका प्रवाह कहीं केन्द्राभिसारी (Centripetal) है, तो कहीं केन्द्रापसारी (Centrifugal)। लगता है कि इनके इसी अनंत रूप का दर्शन करने के बाद ऋषियों ने कहा- सर्वं प्राणमयं जगत्, सम्पूर्ण संसार प्राणमय (प्राण से ओत-प्रोत) है। अतएव इस जगत् या शरीर में जो भी परिवर्तन होते हैं वे इन ऊर्जाओं की विरोधी और अन्योन्याश्रित प्रकृति के कारण होते हैं।

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5 comments:

  1. कल 2/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. Yashwant ji bahut bahut aabhaar aapka. :)

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  3. ज्ञानवर्धक आलेख वास्तव में रोग निकाय के बाह्य एवं आतंरिक दशा में असंतुलन होने से उत्पन्न होते हैं ...मन ओर भौतिक शरीर दोनों में आनंदानुभूति की दशा ही स्वास्थ्य है इसलिए आतंरिक जगत के योगदान के बिना अच्छे स्वास्थ्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती ....गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभ कामनाएं ..ओह्म नमः शिवाय !!!
    सादर अभिनन्दन !!!

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  4. ऋणात्मक और धनात्मक ऊर्जाओं के बारे में सहज और सुंदर जानकारी मिली. आलेख में पैरेग्राफ़ बहुत बडे हो गये हैं थोडा स्पेसियस होता तो पढने में सुविधा रहती. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम

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